IMD July Forecast: भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने जुलाई महीने के लिए जारी अपने ताजा पूर्वानुमान में देशभर में सामान्य से कम बारिश होने की संभावना जताई है। विभाग के अनुसार, जुलाई के दौरान पूरे देश में वर्षा दीर्घकालिक औसत (LPA) का लगभग 94 प्रतिशत रहने का अनुमान है। यह अनुमान ऐसे समय सामने आया है, जब जून 2026 पिछले 125 वर्षों में पांचवां सबसे सूखा जून दर्ज किया गया।
Highlights:
जुलाई में सामान्य से अधिक तापमान का अनुमान
IMD के अनुसार, जुलाई में देश के अधिकांश हिस्सों में तापमान सामान्य से अधिक रह सकता है। इसका असर खरीफ फसलों की खेती पर पड़ने की आशंका है, क्योंकि देश में खरीफ की आधे से अधिक खेती बारिश पर निर्भर करती है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, कई राज्यों में खरीफ फसलों की बुवाई पहले ही देरी से शुरू हुई है।
किन क्षेत्रों में सामान्य या अधिक बारिश की संभावना
IMD प्रमुख मृत्युंजय महापात्र ने बताया कि जुलाई के दौरान देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य से कम बारिश की स्थिति बन सकती है। हालांकि, उत्तर-पश्चिम भारत, पूर्वोत्तर भारत, पूर्वी-मध्य भारत और पूर्वी प्रायद्वीपीय क्षेत्रों के कुछ हिस्सों में सामान्य या उससे अधिक बारिश होने की संभावना है। विभाग ने यह भी कहा है कि जुलाई के शुरुआती 7 से 10 दिनों के दौरान देश के कई हिस्सों में अच्छी बारिश देखने को मिल सकती है, जिससे शुरुआती दौर में कुछ राहत मिलने की उम्मीद है।
यह भी पढ़ें: Dhanbad News: 55 लाख के उप स्वास्थ्य केंद्र के निर्माण पर उठे सवाल, निरीक्षण में क्या मिला?
जून रहा पिछले 125 वर्षों का पांचवां सबसे सूखा महीना
मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, जुलाई सामान्य तौर पर मानसून का सबसे अधिक वर्षा वाला महीना होता है। इस महीने औसतन 280.4 मिमी बारिश होती है, जो पूरे मानसून की लगभग 32 प्रतिशत वर्षा के बराबर है। वहीं, जून में सामान्य रूप से 165.3 मिमी वर्षा दर्ज की जाती है, लेकिन इस वर्ष केवल 99.5 मिमी बारिश हुई, जो सामान्य से करीब 40 प्रतिशत कम रही। इसके चलते जून 2026, वर्ष 1901 के बाद पांचवां सबसे सूखा जून बन गया। वर्ष 2014 के बाद यह सबसे सूखा जून रहा, जबकि रिकॉर्ड के अनुसार वर्ष 2009 सबसे अधिक सूखा जून था, जब केवल 87.6 मिमी वर्षा दर्ज की गई थी।
कम बारिश के पीछे ये रहे प्रमुख कारण
IMD के अनुसार, जून में वर्षा की कमी के पीछे कई कारण रहे। सबसे प्रमुख वजह कम दबाव वाले मौसमीय तंत्र (लो-प्रेशर सिस्टम) का पर्याप्त संख्या में विकसित नहीं होना रहा, जिनसे सामान्यतः अच्छी बारिश होती है। इसके अलावा, प्रशांत महासागर में एल नीनो का प्रभाव भी दिखाई देने लगा है, जिसे मानसून को कमजोर करने वाले प्रमुख कारकों में माना जाता है।






















