जामताड़ा:जामताड़ा जिले के नाला प्रखंड के कालीपत्थर गांव के सोहरपुर टोला में रहने वाले आदिम जनजाति परिवारों ने अपने पारंपरिक हुनर से आत्मनिर्भरता की मिसाल कायम की है। यह परिवार पीढ़ियों से सूप, डाली, झूड़ी, पछिया जैसी पारंपरिक वस्तुएं तैयार कर अपने जीवन यापन का साधन बना रहे हैं।
इन वस्तुओं को बनाने में वे जंगलों से मिलने वाले बांस, खजूर पत्ते और लचकदार टहनियों का उपयोग करते हैं। महिलाएं सुबह से शाम तक बुनाई में जुटी रहती हैं, जबकि पुरुष जंगल से कच्चा माल लाते हैं और तैयार सामान को हाट-बाज़ारों में बेचते हैं।
धीरे-धीरे यह देसी कला गांव की सीमाओं को पार कर कोलकाता, बिहार और झारखंड के कई जिलों तक पहुँच चुकी है। व्यापारी इनसे सामान खरीदकर बड़े बाजारों में बेचते हैं, जिससे गांव की पहचान अब राज्य की सीमाओं से बाहर तक फैल रही है।
ग्रामीणों का कहना है कि पहले इन वस्तुओं की मांग केवल स्थानीय स्तर तक सीमित थी, लेकिन अब शहरी क्षेत्रों में भी देसी हस्तशिल्प और बांस उत्पादों की मांग बढ़ने से उन्हें रोजगार के नए अवसर मिल रहे हैं।
कालीपत्थर गांव की महिलाएं बताती हैं —
“हम बचपन से ये काम कर रहे हैं। अब हमारे बच्चे भी इसे सीख रहे हैं ताकि यह कला आगे भी जिंदा रहे।”
गांव के लोगों का कहना है कि अगर सरकार से आर्थिक सहायता, प्रशिक्षण, बांस काटने की मशीन या विपणन की सुविधा मिल जाए तो वे इस कला को बड़े स्तर पर विकसित कर सकते हैं। फिलहाल वे अपने परिश्रम और लगन के बल पर इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
गांव के बुजुर्ग कहते हैं —
“यह काम हमारे पुरखों से चला आ रहा है। यह सिर्फ रोजगार नहीं, बल्कि हमारी पहचान है।”
कालीपत्थर गांव आज झारखंड के उन चुनिंदा गांवों में शामिल हो गया है, जहाँ मेहनत, परंपरा और आत्मनिर्भरता का अनोखा संगम देखने को मिलता है। इन आदिम जनजाति परिवारों की यह कहानी साबित करती है कि अगर हुनर और हौसला हो, तो सीमित साधनों में भी जिंदगी को रोशन किया जा सकता है।





















