Jamshedpur Youth Heart Disease, जमशेदपुर: भागदौड़ भरी जिंदगी, अनियंत्रित खानपान, मानसिक तनाव और बदलती जीवनशैली के बीच हृदय संबंधी बीमारियां अब केवल उम्रदराज लोगों तक सीमित नहीं रह गई हैं। विशेषज्ञों के अनुसार, युवाओं में भी हार्ट अटैक और अन्य हृदय संबंधी समस्याओं के मामले सामने आ रहे हैं। ब्रह्मानंद अस्पताल, तामोलिया के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. राम नरेश राय ने कहा कि कॉरपोरेट की डेडलाइन, अनियमित काम के घंटे, फास्ट फूड, स्क्रीन टाइम और धूम्रपान जैसी आदतें युवाओं के हृदय स्वास्थ्य को प्रभावित कर रही हैं। उनके अनुसार, शहर के पिछले पांच वर्षों के आंकड़ों में हृदय संबंधी समस्याओं को लेकर अस्पताल पहुंचने वाले मरीजों में करीब 30 से 35 प्रतिशत लोग 40 वर्ष से कम उम्र के हैं। इनमें 25 से 40 वर्ष की उम्र के ऐसे मरीज भी शामिल हैं, जिन्हें हार्ट अटैक या अचानक कार्डियक अरेस्ट जैसी गंभीर स्थिति का सामना करना पड़ा।
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हार्ट अटैक में पहला एक घंटा बेहद महत्वपूर्ण
डॉ. राम नरेश राय ने बताया कि हार्ट अटैक के मामलों में इलाज शुरू करने में देरी गंभीर परिणाम दे सकती है। शुरुआती समय को मेडिकल इमरजेंसी के लिहाज से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। समय पर मरीज को कैथ लैब की सुविधा वाले अस्पताल पहुंचाने और जरूरत पड़ने पर बंद रक्त वाहिका को खोलने से हृदय की मांसपेशियों को होने वाले नुकसान को कम किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि कई बार लोग सीने में भारीपन, जबड़े या पीठ में दर्द और अचानक पसीना आने जैसे लक्षणों को गैस या सामान्य परेशानी समझकर नजरअंदाज कर देते हैं। ऐसे लक्षण दिखाई देने पर देरी करने के बजाय तत्काल चिकित्सकीय सहायता लेना जरूरी है।
30 की उम्र के बाद नियमित स्वास्थ्य जांच पर जोर
हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. संतोष गुप्ता ने कहा कि परिवार में हृदय रोग का इतिहास होने पर कम उम्र से ही स्वास्थ्य को लेकर सतर्क रहना चाहिए। सीने में भारीपन, बायीं बांह या जबड़े में दर्द, अचानक पसीना आना और घबराहट जैसे लक्षणों को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए। उन्होंने 30 वर्ष की उम्र के बाद नियमित रूप से लिपिड प्रोफाइल, ईसीजी और ब्लड शुगर जैसी जांच कराने की सलाह दी। साथ ही रोजाना 30 से 40 मिनट पैदल चलने, संतुलित खानपान अपनाने और पर्याप्त नींद लेने पर जोर दिया। डॉ. गुप्ता के अनुसार, भोजन में हरी सब्जियां, मौसमी फल, फाइबर और मोटे अनाज शामिल किए जा सकते हैं। वहीं तला-भुना भोजन, मैदा और अधिक चीनी का सेवन सीमित रखना चाहिए। सोने से पहले मोबाइल स्क्रीन का इस्तेमाल कम करने और धूम्रपान व तंबाकू से पूरी तरह दूरी बनाने की भी सलाह दी गई।
जंक फूड और स्क्रीन टाइम से बच्चों की सेहत पर असर
एमजीएम अस्पताल के शिशु रोग विशेषज्ञ एवं शिशु विभागाध्यक्ष डॉ. केके चौधरी ने बच्चों की बदलती जीवनशैली को लेकर चिंता जताई। उन्होंने कहा कि बढ़ता मोटापा, जंक फूड, लंबे समय तक स्क्रीन पर रहना, आउटडोर खेलों से दूरी और पढ़ाई का तनाव बच्चों के स्वास्थ्य पर असर डाल सकता है। उनके अनुसार, ओपीडी में आने वाले कई बच्चों में वजन बढ़ने की समस्या देखने को मिल रही है। चिप्स, बर्गर, पिज्जा और मीठे पेय जैसे अधिक प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों का लगातार सेवन संतुलित आहार का विकल्प नहीं हो सकता। बच्चों में शारीरिक गतिविधि की कमी से वजन और मेटाबॉलिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याओं का जोखिम बढ़ सकता है। डॉ. चौधरी ने बच्चों के स्क्रीन टाइम को सीमित करने और उन्हें नियमित खेलकूद के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत बताई।
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युवाओं में फिटनेस का बढ़ा रुझान, लेकिन सावधानी भी जरूरी
फिटनेस ट्रेनर आयुष्मान हर्ष के अनुसार, 18 से 30 वर्ष के युवाओं में जिम, रनिंग और फंक्शनल ट्रेनिंग को लेकर रुचि बढ़ी है। कई युवा फिटनेस को केवल बॉडी बिल्डिंग के बजाय तनाव कम करने और स्टेमिना बढ़ाने के माध्यम के रूप में भी देख रहे हैं। हालांकि, उन्होंने बिना विशेषज्ञ की सलाह के बहुत अधिक वजन उठाने के चलन को लेकर सावधानी बरतने की बात कही। सोशल मीडिया से प्रभावित होकर अचानक भारी वर्कआउट शुरू करना चोट का कारण बन सकता है। विशेषज्ञों ने अभिभावकों से बच्चों को रोजाना आउटडोर गतिविधियों के लिए प्रोत्साहित करने और युवाओं को संतुलित खानपान अपनाने की सलाह दी। किसी भी व्यक्ति को सीने में दर्द या अन्य गंभीर लक्षण दिखाई देने पर खुद इलाज करने के बजाय तत्काल चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिए।






















