Japan Earthquake Preparedness: 7.1 तीव्रता का भूकंप किसी भी देश में भारी तबाही मचा सकता है। फिर भी, जापान में ऐसे भूकंपों से अक्सर बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान नहीं होता। इसका कारण सिर्फ़ आधुनिक तकनीक नहीं है, बल्कि दशकों में विकसित एक ऐसा सिस्टम है जिसमें सरकार, वैज्ञानिक, इंजीनियर और आम नागरिक सभी सक्रिय भूमिका निभाते हैं।
Highlights:
जापान की रणनीति: भूकंप को रोकने के बजाय नुकसान को कम करना
जापान दुनिया के उन देशों में से एक है जहाँ भूकंप का खतरा सबसे ज़्यादा होता है। यह प्रशांत महासागर के ‘रिंग ऑफ़ फायर’ पर स्थित है, जहाँ हर साल हज़ारों भूकंप आते हैं—जिनमें हल्के झटकों से लेकर बड़े भूकंप तक शामिल हैं। इसके बावजूद, बड़े पैमाने पर जान-माल का नुकसान अपेक्षाकृत कम होता है क्योंकि देश ने ऐसी आपदाओं के बीच सुरक्षित रहने के लिए एक मज़बूत सिस्टम विकसित किया है। देश में नई इमारतें भूकंप-रोधी कड़े मानकों के अनुसार बनाई जाती हैं। इनमें बेस आइसोलेशन, शॉक एब्जॉर्बर और लचीले स्ट्रक्चरल डिज़ाइन जैसी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है। पुरानी इमारतों को भी समय-समय पर भूकंप-रोधी मानकों के अनुरूप मज़बूत किया जाता है।
अर्ली वार्निंग सिस्टम (शुरुआती चेतावनी प्रणाली) से मिलते हैं कीमती सेकंड
जापान का भूकंप अर्ली वार्निंग सिस्टम उसकी सबसे बड़ी ताकतों में से एक माना जाता है। देश भर में लगे हज़ारों सेंसर ज़मीन की हलचल पर लगातार नज़र रखते हैं। शुरुआती भूकंपीय तरंगों का पता चलने के कुछ ही सेकंड के भीतर, मोबाइल फ़ोन, टेलीविज़न, रेडियो और पब्लिक ब्रॉडकास्ट सिस्टम के ज़रिए जनता को चेतावनी भेज दी जाती है। साथ ही, कई सुरक्षा सिस्टम अपने-आप सक्रिय हो जाते हैं। शिंकानसेन (बुलेट ट्रेन) रुक जाती हैं, गैस सप्लाई बंद हो जाती है, न्यूक्लियर प्लांट सेफ़्टी मोड में चले जाते हैं और लिफ़्ट सबसे नज़दीकी फ़्लोर पर रुक जाती हैं। ये कुछ कीमती सेकंड हज़ारों लोगों की जान बचाने में अहम भूमिका निभाते हैं।
नागरिकों की तैयारी: एक मुख्य ताकत
जापान में आपदा प्रबंधन सिर्फ़ सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है। स्कूलों, कॉलेजों, दफ़्तरों, अस्पतालों और रिहायशी इलाकों में नियमित रूप से मॉक ड्रिल (अभ्यास) की जाती हैं। बच्चों को बहुत कम उम्र से ही सिखाया जाता है कि भूकंप के दौरान सुरक्षित कैसे रहना है। ज़्यादातर परिवार घर पर इमरजेंसी किट तैयार रखते हैं, जिसमें पीने का पानी, दवाएँ, फ़्लैशलाइट, बैटरी, खाना और अन्य ज़रूरी चीज़ें होती हैं। सरकार नियमित रूप से लोगों में जागरूकता भी बढ़ाती है, ताकि आपदा के समय लोग घबराने के बजाय तय सुरक्षा नियमों का पालन करें।
भारत के लिए क्या सीख है?
भारत का भी एक बड़ा हिस्सा भूकंप-संवेदनशील क्षेत्रों में आता है। हिमालयी राज्य, दिल्ली-NCR, गुजरात और पूर्वोत्तर क्षेत्र उन इलाकों में शामिल हैं जहाँ भूकंप का खतरा बहुत ज़्यादा है। जानकारों का मानना है कि अगर भारत भूकंप-रोधी बिल्डिंग कोड को सख्ती से लागू करे, शुरुआती चेतावनी देने वाले सिस्टम का विस्तार करे, नियमित रूप से मॉक ड्रिल करे और लोगों में जागरूकता बढ़ाए, तो भविष्य में बड़े भूकंपों से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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जापान की तैयारियों पर एक नज़र:
- यह देश प्रशांत महासागर के ‘रिंग ऑफ़ फायर’ पर स्थित है।
- यहाँ हर साल हज़ारों भूकंप आते हैं—जिनमें हल्के से लेकर तेज़ भूकंप तक शामिल हैं।
- दुनिया के सबसे सख्त भूकंप-रोधी बिल्डिंग कोड लागू हैं।
- पूरे देश में भूकंप की शुरुआती चेतावनी देने वाला एक्टिव सिस्टम है।
- बुलेट ट्रेन, गैस सप्लाई और न्यूक्लियर प्लांट अपने-आप सेफ्टी मोड में चले जाते हैं।
- स्कूलों और ऑफिसों में नियमित मॉक ड्रिल होती हैं।
- ज़्यादातर परिवार पहले से ही इमरजेंसी किट तैयार रखते हैं।






















