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Tuesday, April 21, 2026

दुर्गा पूजा पर क्यों निभाई जाती है सिंदूर खेला की रस्म? जानिए इस सदियों पुराने रिवाज का महत्व…

नवरात्रि का पर्व देवी शक्ति के आगमन और उनके सम्मान में मनाया जाता है। विशेष रूप से षष्ठी से विजयादशमी तक के पांच दिन बंगाल, असम, ओडिशा, त्रिपुरा, झारखंड और बांग्लादेश में विशेष उत्सव का माहौल रहता है। बंगाली संस्कृति में दुर्गा पूजा सिर्फ एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि एक गहरा सांस्कृतिक अनुभव भी है। इन्हीं खास परंपराओं में से एक है – सिंदूर खेला

क्या है सिंदूर खेला?

सिंदूर खेला, दुर्गा पूजा की समाप्ति पर विजयादशमी (दशहरा) के दिन मनाया जाने वाला एक विशेष रिवाज़ है। इस रस्म में विवाहित महिलाएं माता दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर अपने अखंड सौभाग्य और वैवाहिक सुख की कामना करती हैं।

सिंदूर खेला का इतिहास

ऐसा माना जाता है कि सिंदूर खेला की परंपरा लगभग 400 साल पुरानी है। इसकी शुरुआत पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश के कुछ हिस्सों में हुई थी, जो धीरे-धीरे पूरे भारत में फैल गई। आज यह रस्म दुर्गा पूजा के सबसे भावनात्मक और प्रतीकात्मक क्षणों में से एक मानी जाती है।

कैसे निभाई जाती है ये रस्म?

सिंदूर खेला के दिन महिलाएं पारंपरिक लाल-सफेद साड़ी, गहनों और श्रृंगार से सजती हैं। पूजा के अंत में वे:

  • सबसे पहले मां दुर्गा के माथे और चरणों पर सिंदूर अर्पित करती हैं।
  • फिर एक-दूसरे के माथे, गाल और मांग में सिंदूर लगाती हैं
  • पान के पत्ते से मां का चेहरा स्पर्श करती हैं, जो मां के विदाई के समय आंसू पोंछने का प्रतीक होता है।
  • देवी को चूड़ियां (शाखा-पोला) और मिठाइयाँ चढ़ाई जाती हैं।
  • अंत में महिलाएं एक-दूसरे को मिठाई खिलाकर, सुखी और समृद्ध वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं।

इस रस्म का भावनात्मक पक्ष

मान्यता है कि नवरात्रि में मां दुर्गा अपने मायके (पृथ्वी) आती हैं और दशमी के दिन अपने ससुराल (कैलाश) लौट जाती हैं। सिंदूर खेला, मां की विदाई के समय एक बेटी, एक बहन, एक मां की विदाई की तरह भावुक क्षण होता है। इसमें सौंदर्य, श्रद्धा और स्नेह का अनोखा संगम होता है।

सिंदूर खेला 2025 में कब मनाया जाएगा?

इस वर्ष विजयादशमी (दशहरा) 2 अक्टूबर 2025, गुरुवार को पड़ रही है। इसी दिन सिंदूर खेला की रस्म भी निभाई जाएगी

 

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