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Thursday, September 10, 2026

दशहरा 2025: बन रहे हैं कई शुभ योग, जानिए रावण दहन का मुहूर्त और विजयदशमी का महत्व….

आज 2 अक्टूबर 2025, गुरुवार को आश्विन मास के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि है। यही तिथि भारतभर में विजयदशमी या दशहरा के रूप में मनाई जाती है। यह पर्व अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक है, जब भगवान श्रीराम ने रावण का वध किया और मां दुर्गा ने महिषासुर का संहार किया था।

दशहरा 2025 का पंचांग

  • तिथि: शुक्ल दशमी – शाम 07:10 बजे तक
  • दिन: गुरुवार
  • मास: आश्विन (पूर्णिमांत)
  • संवत्सर: 2082
  • पक्ष: शुक्ल पक्ष
  • सूर्य राशि: कन्या
  • चंद्र राशि: धनु
  • नक्षत्र: उत्तराषाढ़ (प्रातः 09:13 बजे तक)

सूर्योदय और सूर्यास्त

  • सूर्योदय: सुबह 06:15 बजे
  • सूर्यास्त: शाम 06:06 बजे

चंद्रमा का समय

  • चंद्रमा उदय: दोपहर 03:09 बजे
  • चंद्रास्त: 3 अक्टूबर को सुबह 01:56 बजे

शुभ योग

  • योग: सुकरण (रात्रि 11:29 बजे तक)
  • करण:
    • तैतिल – सुबह 07:11 बजे तक
    • गरज – शाम 07:10 बजे तक

रावण दहन का मुहूर्त – कब करें बुराई का अंत?

रावण दहन प्रदोष काल में किया जाता है, जब दिन ढल चुका हो और अंधेरा शुरू हो रहा हो।
इस वर्ष सूर्यास्त शाम 06:06 बजे होगा, इसलिए रावण दहन का आदर्श समय सूर्यास्त के बाद, शाम 06:15 बजे से रात 07:30 बजे के बीच रहेगा। यह काल प्रदोष काल कहलाता है और अत्यंत शुभ माना गया है।


आज के शुभ-अशुभ मुहूर्त

शुभ समय

  • अभिजीत मुहूर्त: सुबह 11:46 से 12:34 तक
  • अमृत काल: रात 11:01 से 12:38 (03 अक्टूबर को)

अशुभ समय

  • राहुकाल: दोपहर 01:39 से 03:08 तक
  • गुलिक काल: सुबह 09:12 से 10:41 तक
  • यमगण्ड: सुबह 06:15 से 07:43 तक

विजयदशमी का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व

विजयदशमी, जिसे दशहरा भी कहा जाता है, केवल एक त्योहार नहीं बल्कि धार्मिक, नैतिक और आत्मिक विजय का दिन है।
यह दिन हमें याद दिलाता है कि:

  • भगवान राम ने रावण रूपी अहंकार और अधर्म का अंत किया।
  • मां दुर्गा ने महिषासुर जैसे राक्षस को पराजित कर धर्म की स्थापना की।

इस दिन रावण दहन केवल प्रतीकात्मक अग्नि नहीं, बल्कि हमारे भीतर की नकारात्मकताओं – जैसे क्रोध, लोभ, ईर्ष्या, घृणा और अहंकार को जलाने का अवसर है।

“सत्य और धर्म चाहे जितना भी संघर्ष करें, अंत में वही विजयी होते हैं।”

विशेष संयोग और नक्षत्र प्रभाव

इस दशहरे पर उत्तराषाढ़ नक्षत्र, सुकरण योग, और प्रदोष काल जैसे शुभ संयोग बन रहे हैं, जो इसे और भी पावन और फलदायी बनाते हैं।

उत्तराषाढ़ नक्षत्र के देवता विश्वदेव माने जाते हैं, जो अप्रतिद्वंद्वी विजय के प्रतीक हैं। इस नक्षत्र में की गई पूजा और रावण दहन से शत्रुओं पर विजय, आत्मबल में वृद्धि और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का आगमन होता है।

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