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Thursday, October 8, 2026

Jharkhand Tribal Freedom Fighters: झारखंड के 5 आदिवासी वीर, जिनके संघर्ष ने अंग्रेजी हुकूमत को दी चुनौती

Jharkhand Tribal Freedom Fighters: स्वतंत्रता दिवस केवल देश की आजादी का उत्सव मनाने का अवसर नहीं है, बल्कि उन वीरों को याद करने का दिन भी है, जिन्होंने देश और अपनी धरती की रक्षा के लिए संघर्ष किया। झारखंड की धरती का स्वतंत्रता आंदोलन और आदिवासी विद्रोहों का इतिहास बेहद समृद्ध रहा है। अंग्रेजी शासन के दौरान जल, जंगल और जमीन पर अधिकार, शोषण तथा दमनकारी व्यवस्था के खिलाफ झारखंड के कई आदिवासी जननायकों ने संघर्ष किया। उनके आंदोलनों ने स्थानीय समाज में जागरूकता पैदा की और ब्रिटिश शासन के खिलाफ प्रतिरोध को मजबूत किया। स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर आइए झारखंड के पांच प्रमुख आदिवासी स्वतंत्रता सेनानियों और जननायकों को याद करें।

भगवान बिरसा मुंडा: उलगुलान के महानायक

भगवान बिरसा मुंडा को झारखंड में ‘धरती आबा’ के नाम से सम्मानपूर्वक याद किया जाता है। उन्होंने छोटानागपुर क्षेत्र में आदिवासी समाज को संगठित करते हुए अंग्रेजी शासन, जमींदारी शोषण और जमीन से जुड़े अधिकारों के खिलाफ आंदोलन खड़ा किया। बिरसा मुंडा के नेतृत्व में उलगुलान ने ब्रिटिश प्रशासन को बड़ी चुनौती दी। कम उम्र में ही उन्होंने आदिवासी समाज में सामाजिक और राजनीतिक चेतना पैदा की। अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार किया और वर्ष 1900 में रांची जेल में उनका निधन हुआ। बिरसा मुंडा का संघर्ष आज भी झारखंड में सामाजिक अधिकार और स्वाभिमान की प्रेरणा माना जाता है।

बाबा तिलका मांझी: अंग्रेजी शासन के खिलाफ शुरुआती विद्रोह

बाबा तिलका मांझी का नाम अंग्रेजी शासन के खिलाफ शुरुआती आदिवासी विद्रोहों में प्रमुखता से लिया जाता है। उन्होंने 18वीं सदी के अंतिम दौर में संथाल परगना क्षेत्र में अंग्रेजी शासन और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ संघर्ष किया। उनके नेतृत्व में आदिवासी समुदाय ने ब्रिटिश प्रशासन का विरोध किया। तिलका मांझी को अंततः अंग्रेजों ने गिरफ्तार कर लिया और उन्हें फांसी दी गई। उनका संघर्ष बाद के आदिवासी आंदोलनों के लिए भी महत्वपूर्ण प्रेरणा बना।

सिदो-कान्हू: संथाल हूल के महानायक

30 जून 1855 को भोगनाडीह से शुरू हुए संथाल हूल का नेतृत्व सिदो मुर्मू और कान्हू मुर्मू ने किया। उनके साथ चांद और भैरव समेत बड़ी संख्या में संथाल समुदाय के लोग भी इस आंदोलन से जुड़े। यह विद्रोह अंग्रेजी शासन के साथ-साथ महाजनी और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ भी था। पारंपरिक हथियारों के साथ बड़ी संख्या में आदिवासी इस आंदोलन में शामिल हुए। सिदो-कान्हू का नाम आज भी संथाल हूल और झारखंड के आदिवासी प्रतिरोध के इतिहास में प्रमुखता से लिया जाता है।

जतरा टाना भगत: अहिंसा के रास्ते पर आंदोलन

गुमला क्षेत्र से जुड़े जतरा टाना भगत ने 20वीं सदी के शुरुआती दौर में टाना भगत आंदोलन का नेतृत्व किया। यह आंदोलन सामाजिक और धार्मिक सुधार के साथ अंग्रेजी शासन के विरोध से भी जुड़ा था। टाना भगतों ने कर और बेगारी जैसी व्यवस्थाओं का विरोध किया तथा असहयोग और अहिंसा का रास्ता अपनाया। बाद के दौर में टाना भगत आंदोलन का संबंध महात्मा गांधी और स्वतंत्रता आंदोलन की व्यापक धारा से भी जुड़ा। जतरा टाना भगत का आंदोलन झारखंड में अहिंसक प्रतिरोध की एक महत्वपूर्ण मिसाल माना जाता है।

वीर बुधु भगत: कोल विद्रोह के प्रमुख सेनानी

वीर बुधु भगत का नाम 1831-32 के कोल विद्रोह से जुड़ा है। उन्होंने छोटानागपुर क्षेत्र में अंग्रेजी शासन और शोषणकारी व्यवस्था के खिलाफ आदिवासी समुदाय को संगठित किया। बुधु भगत और उनके समर्थकों ने ब्रिटिश प्रशासन के खिलाफ सशस्त्र प्रतिरोध किया। अंग्रेजी सेना के साथ संघर्ष के दौरान उन्होंने अपने साथियों के साथ अंतिम समय तक मुकाबला किया। वीर बुधु भगत का बलिदान झारखंड के आदिवासी संघर्ष के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।

झारखंड की धरती ने दिया संघर्ष और स्वाभिमान का संदेश

बिरसा मुंडा, तिलका मांझी, सिदो-कान्हू, जतरा टाना भगत और बुधु भगत जैसे जननायकों के संघर्ष झारखंड के इतिहास का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। इनके आंदोलनों की परिस्थितियां और तरीके अलग-अलग रहे, लेकिन इनके संघर्षों में अपनी जमीन, अधिकार, सम्मान और शोषण के विरोध की भावना प्रमुख रही। स्वतंत्रता दिवस पर इन वीरों को याद करना केवल इतिहास को दोहराना नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को उनके संघर्ष और बलिदान से परिचित कराने का भी अवसर है।

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