धनबाद/चाईबासा:झारखंड में स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए हैं, जब चाईबासा सदर अस्पताल में थैलेसीमिया से पीड़ित पाँच मासूम बच्चों को एचआईवी संक्रमित खून चढ़ाए जाने की भयावह घटना सामने आई। इन सभी बच्चों की रिपोर्ट अब एचआईवी पॉज़िटिव आई है।
Highlights:
इस घटना ने पूरे राज्य में आक्रोश और पीड़ा की लहर फैला दी है। इसी के मद्देनज़र धनबाद जिले के समाजसेवियों ने एकजुट होकर कहा — “अब बदलाव ज़रूरी है।”
समाजसेवियों की बैठक, पर प्रशासन की गैरमौजूदगी
धनबाद जिले के विभिन्न क्षेत्रों से आए समाजसेवियों और स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों के बीच एक बैठक प्रस्तावित थी।
सभी समाजसेवी समय पर सुबह 11 बजे पहुँच गए, लेकिन 12:30 बजे तक सिविल सर्जन न तो उपस्थित हुए और न ही कोई सूचना दी गई।
समाजसेवियों ने इसे “निराशाजनक और असंवेदनशील रवैया” बताया और कहा कि इससे जनसेवा में लगे स्वयंसेवकों के समर्पण को ठेस पहुँची है।
“रक्तदान हमारा धर्म है, सहयोग सरकार का कर्तव्य होना चाहिए”
समाजसेवियों ने कहा कि झारखंड के सभी ज़िलों में बिना सरकारी सहयोग के समाजसेवी रक्तदान शिविर आयोजित करते हैं।
चाहे थैलेसीमिया पीड़ित बच्चे हों, डायलिसिस मरीज, कैंसर रोगी या सड़क दुर्घटना के पीड़ित — हर स्थिति में समाजसेवक आगे बढ़कर रक्तदान कर ज़िंदगियाँ बचा रहे हैं।
फिर भी, स्वास्थ्य विभाग की ओर से न स्थान मिलता है, न सहयोग, और न ही प्रशंसा — बावजूद इसके, सिविल सर्जन कार्यालय समाजसेवियों से शिविरों का डेटा (रिपोर्ट) मांगता है।
समाजसेवियों ने सवाल किया —
“जब कोई सहायता नहीं मिलती, तो डेटा माँगने का अधिकार किसे है?”
समाजसेवियों की माँग
- सरकार सभी सरकारी कार्यालयों में वर्ष में कम-से-कम एक रक्तदान शिविर आयोजित करने का निर्देश जारी करे।
- स्वास्थ्य विभाग समाजसेवियों को सुविधा और सहयोग प्रदान करे।
- हर अस्पताल में ब्लड स्क्रीनिंग और ट्रांसफ्यूजन प्रक्रिया की नियमित निगरानी हो।
“रक्तदान केवल सेवा नहीं, एक संस्कार है”
समाजसेवियों ने कहा —
“हम सब मिलकर मानवता के इस महायज्ञ को आगे बढ़ाएँ।
जब तक समाज जागरूक नहीं होगा और प्रशासन संवेदनशील नहीं बनेगा, तब तक ऐसी घटनाएँ रुकेंगी नहीं।”






















