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Monday, November 2, 2026

Kali Devi Chhath Songs: शारदा सिन्हा से पहले भी थीं छठ गीतों की आवाज, जानिए मुजफ्फरपुर की काली देवी की कहानी

Kali Devi Chhath Songs: छठ महापर्व का नाम आते ही लोगों के मन में लोकगायिका शारदा सिन्हा के मधुर गीत गूंजने लगते हैं। उनके गीतों ने छठ की सांस्कृतिक पहचान को देश-दुनिया तक पहुंचाया। लेकिन बिहार के छठ गीतों का इतिहास इससे भी पुराना है। पुराने ग्रामोफोन रिकॉर्ड और शोध सामग्री के आधार पर मुजफ्फरपुर की काली देवी का नाम उन शुरुआती गायिकाओं में लिया जाता है, जिनकी आवाज में छठ के गीत रिकॉर्ड किए गए थे। हालांकि, समय के साथ उनकी पहचान और योगदान लोकस्मृति में कहीं पीछे छूट गए।

काली देवी की कहानी केवल संगीत और गायकी की नहीं है। यह उस दौर की सामाजिक परिस्थितियों और कलाकारों को उनकी सामाजिक पहचान के आधार पर मिलने वाली जगह की कहानी भी है। उनके गीतों का उल्लेख मिलता है, लेकिन उन्हें वह व्यापक पहचान नहीं मिल सकी जिसकी उनकी संगीत विरासत हकदार थी।

मुजफ्फरपुर में हुआ था काली देवी का जन्म

उपलब्ध शोध सामग्री के अनुसार, काली देवी का जन्म वर्ष 1920 में मुजफ्फरपुर के रेड लाइट इलाके में हुआ था। उनका पूरा जीवन इसी सामाजिक परिवेश में बीता। वर्ष 2003 में करीब 83 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया।

शोधकर्ता अर्मेला मेसिवेस्की ने वर्ष 1997 से 2005 के बीच मुजफ्फरपुर का दौरा किया था। इस दौरान उन्होंने काली देवी के परिवार से मुलाकात की और उनके जीवन तथा संगीत से जुड़ी जानकारियां जुटाईं। शोध में बताया गया है कि काली देवी को केवल तवायफ की पहचान तक सीमित किया जाना पसंद नहीं था। उनका मानना था कि तवायफ भी एक कलाकार और गायिका हो सकती है।

छठ गीतों में गरीबी और पलायन का दर्द

काली देवी से जुड़े चर्चित गीतों में ‘मोरे भैया महंगा मुंगेर’ और ‘बांस के बंगइया’ का उल्लेख मिलता है। इन गीतों में छठ पूजा की परंपराओं के साथ-साथ उस समय के सामाजिक और आर्थिक हालात की झलक भी दिखाई देती है। गरीबी, महंगाई, पलायन और परिवार से दूर रहने की पीड़ा उनके गीतों के भाव में शामिल थी।

‘मोरे भैया महंगा मुंगेर’ गीत में एक बहन अपने भाई से छठ पूजा के लिए जरूरी सामान लाने की बात कहती है। भाई महंगाई और आर्थिक मजबूरी का हवाला देता है, लेकिन बहन छठ व्रत छोड़ने को तैयार नहीं होती। इस प्रसंग के माध्यम से पूजा के प्रति आस्था और आर्थिक कठिनाइयों के बीच का संघर्ष सामने आता है।

Kali Devi Chhath Songs 1

समय के साथ बदलते गए गीतों के बोल और अर्थ

शोध सामग्री में यह भी उल्लेख मिलता है कि बाद के वर्षों में काली देवी से जुड़े कुछ गीतों को दूसरे गायकों ने अलग-अलग अंदाज में प्रस्तुत किया। इस दौरान गीतों के बोल और उनके अर्थ में भी बदलाव हुए। इससे कई जगह मूल गीतों का भाव बदल गया और उनकी शुरुआती रचनात्मक पहचान पीछे छूटती चली गई।

लोकगीतों की परंपरा में समय के साथ बदलाव होना सामान्य है, लेकिन ऐसे बदलावों के बीच मूल गायकों और उनकी प्रस्तुतियों का इतिहास सुरक्षित रखना भी जरूरी है। काली देवी का उदाहरण इस बात की ओर ध्यान दिलाता है कि लोकसंगीत की विरासत में कई ऐसी आवाजें रही हैं, जिन्हें पर्याप्त पहचान नहीं मिली।

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1984 में दिल्ली के महिला संगीत समारोह में दी थी प्रस्तुति

काली देवी ने वर्ष 1984 में दिल्ली में आयोजित महिला संगीत समारोह में भी अपनी प्रस्तुति दी थी। इसके बावजूद उन्हें व्यापक लोकप्रियता और पहचान नहीं मिल सकी। उनके जीवन और संगीत से जुड़े शोध तथा पुराने रिकॉर्ड आज उनके योगदान को समझने का एक महत्वपूर्ण आधार हैं।

छठ के अवसर पर जब शारदा सिन्हा और दूसरे लोकगायकों के गीत सुनाई देते हैं, तब काली देवी जैसी पुरानी गायिकाओं को याद करना भी जरूरी है। उनकी कहानी बताती है कि बिहार के लोकसंगीत का इतिहास केवल प्रसिद्ध नामों तक सीमित नहीं है। इसके पीछे कई ऐसी कलाकारों की मेहनत और आवाजें भी हैं, जिन्होंने सामाजिक चुनौतियों के बीच लोकपरंपराओं को अपनी गायकी से आगे बढ़ाया।

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