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Tuesday, October 27, 2026

दिल्ली सरस आजीविका मेला में सिमडेगा की दीदियों ने लहराया परचम…

सिमडेगा:नई दिल्ली स्थित मेजर ध्यानचंद स्टेडियम में 5 से 22 सितंबर 2025 तक आयोजित हो रहे सरस आजीविका मेला में सिमडेगा जिले से समूह की महिलाएँ अपने हुनर और मेहनत से नई पहचान बना रही हैं। झारखंड राज्य ग्रामीण आजीविका मिशन (जेएसएलपीएस) के सहयोग से ब्रांड पलाश के तहत प्रदर्शित किए जा रहे स्थानीय उत्पाद खरीदारों के बीच विशेष आकर्षण का केंद्र बने हुए हैं।

सिमडेगा के कोलेबिरा प्रखंड की रहने वाली ब्रिजिट कडूलना कभी साधारण ग्रामीण महिला थीं। घर की जिम्मेदारियों के बीच जब उन्होंने मां बाघचंडी आजीविका सखी मंडल से जुड़कर स्वयं सहायता समूह की शक्ति को अपनाया, तो उनकी ज़िंदगी ने नया मोड़ लिया। समूह के माध्यम से उन्हें ऋण मिला और उन्होंने मडुआ (रागी) की खेती शुरू की।

धीरे-धीरे खेती के साथ उन्होंने सोचा कि क्यों न मडुआ से बने मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार किए जाएँ। इसी सोच से उन्होंने मडुआ लड्डू, चाणाचूर, मडुआ पापड़, सफेद और काले तिल के लड्डू, अचार और मधुरस जैसे उत्पाद बनाना शुरू किया।

जेएसएलपीएस और ब्रांड पलाश के सहयोग से ब्रिजिट को अपने उत्पाद बेचने का स्थायी मंच मिला। उनके उत्पाद पलाश मार्ट, विभिन्न मेलों और स्थानीय बाज़ार में बिकने लगे। गुणवत्ता और परंपरागत स्वाद के कारण इन उत्पादों को ग्राहकों ने हाथों-हाथ लिया।

उनकी लगातार मेहनत और लगन ने उन्हें ‘लखपति दीदी’ की श्रेणी में ला खड़ा किया। आज वह सिर्फ अपने परिवार का सहारा नहीं, बल्कि अपने इलाके की अन्य महिलाओं के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं।

इस वर्ष ब्रिजिट दूसरी बार दिल्ली सरस मेला में भाग ले रही हैं। स्टॉल नंबर 149 पर उनके मडुआ आधारित उत्पाद ग्राहकों को खूब आकर्षित कर रहे हैं। पहले ही दिन उनकी बिक्री 15 से 16 हज़ार रुपये तक पहुँच चुकी है। उनका लक्ष्य है कि मेले की समाप्ति तक वह एक लाखों रुपये से अधिक की कमाई करें।

ब्रिजिट की सफलता कहानी केवल उनकी व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं है, बल्कि यह दिखाती है कि सामूहिकता, आत्मविश्वास और सरकारी योजनाओं का सही उपयोग किस तरह ग्रामीण महिलाओं की जिंदगी बदल सकता है।

आज वह पूरे आत्मविश्वास से कहती हैं कि “सखी मंडल से जुड़कर मुझे नई दिशा मिली। अब मैं न सिर्फ अपने परिवार को संभाल रही हूँ बल्कि अपने जिले और राज्य का नाम रोशन कर रही हूँ।”

दिल्ली सरस मेला में ब्रिजिट जैसी महिलाएँ यह साबित कर रही हैं कि गाँव की मिट्टी में पला हुआ परिश्रम, जब सही मार्गदर्शन और बाज़ार से जुड़ता है, तो वह न सिर्फ आर्थिक आत्मनिर्भरता लाता है बल्कि महिला सशक्तिकरण की नई मिसाल भी गढ़ता है।

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