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Monday, October 26, 2026

लोहे की जंजीरों में जकड़ी हैं मां काली, दीप की लौ से ही होती हैं प्रसन्न…

धनबाद:धनबाद जिले के गोविंदपुर प्रखंड अंतर्गत रतनपुर गांव में स्थित मां काली के एक अनोखे मंदिर में आस्था और रहस्य का अनूठा संगम देखने को मिलता है। यहां की काली मां की प्रतिमा लोहे की जंजीरों से जकड़ी हुई है—लेकिन यह जकड़न श्रद्धा का प्रतीक है, न कि बंधन का।

मां को पसंद है दीप की रौशनी, बिजली से होती हैं खिन्न

इस मंदिर की सबसे खास बात यह है कि यहां बिजली की रौशनी नहीं, बल्कि ज्योत और दीपक की लौ को ही प्राथमिकता दी जाती है। मान्यता है कि मां काली को कृत्रिम रौशनी पसंद नहीं, और यदि बिजली का उपयोग अधिक हो, तो माँ अप्रसन्न होती हैं। यही कारण है कि मंदिर परिसर में आम दिनों में केवल दीप और अखंड ज्योत से ही रोशनी होती है। केवल सफाई और विशेष पूजन के समय थोड़े समय के लिए बिजली का उपयोग किया जाता है।

मंदिर में कई बार बिजली के तार शॉर्ट सर्किट होकर जलने की घटनाएं भी सामने आई हैं। यही कारण है कि बिजली की आपूर्ति सीमित और सावधानीपूर्वक की जाती है।

मां की प्रतिमा में आता है कंपन, वर्षों पुरानी मान्यता

स्थानीय पुजारी शष्टी राठौर बताते हैं कि इस मंदिर में स्थापित मां काली की प्रतिमा 1995 में पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले से लाई गई थी। मुग्मा निवासी सुभाष राय को सपने में मां काली ने दर्शन दिए और प्रतिमा को यहां स्थापित करने का आदेश दिया। तब एक पहाड़ी इलाके (टांड़) से मां की प्रतिमा लाकर रतनपुर में मंदिर की स्थापना हुई।

स्थापना के बाद से ही कई रहस्यमयी घटनाएं होने लगीं—जैसे मंदिर में अपने आप टूट-फूट, जेनरेटर बार-बार खराब होना, तारों का जल जाना, और पूजा के समय मां की मूर्ति में हल्का कंपन महसूस होना। लोग कहने लगे कि मां क्षेत्र में विचरण करती हैं और अपने विकराल रूप से लोगों को दर्शन देती हैं, जिससे भय का माहौल भी बना रहा।

जंजीरें हार हैं, बंधन नहीं

इन घटनाओं से परेशान होकर पुजारी ने पश्चिम बंगाल के महतोड़ गांव के प्रसिद्ध काली मंदिर के तुलसी शास्त्री से संपर्क किया। वहां की परंपरा अनुसार, मां काली को हार के रूप में लोहे की जंजीरें पहनाई जाती हैं। यह कोई बंदिश नहीं, बल्कि श्रद्धा का प्रतीक है।

तुलसी शास्त्री के सुझाव पर महतोड़ से लाई गई पवित्र मिट्टी और ज्योत को इस मंदिर में स्थापित किया गया, और मां को भी हार स्वरूप लोहे की जंजीर पहनाई गई। इसके बाद से मंदिर की सभी समस्याएं समाप्त हो गईं। पुजारी कहते हैं,

“मां को जंजीरों में बांधना इंसानों के बस की बात नहीं, लेकिन भक्त की श्रद्धा मां स्वीकार करती हैं।”

दो बार होती है विशेष पूजा, दूर-दराज़ से आते हैं श्रद्धालु

मंदिर में साल भर पूजा-अर्चना होती रहती है, लेकिन दो अवसरों पर भव्य पूजा होती है—

  1. दीपावली पर काली पूजा
  2. मई महीने में विशेष वार्षिक पूजा

इन अवसरों पर झारखंड के साथ-साथ बिहार, पश्चिम बंगाल और ओड़िशा से बड़ी संख्या में श्रद्धालु यहां मां के दर्शन के लिए पहुंचते हैं। श्रद्धालु मानते हैं कि यहां मां काली मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं और सच्चे भाव से मांगी गई मुरादें जरूर पूरी होती हैं।

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