धनबाद:पूर्वी टुंडी प्रखंड अंतर्गत सिंगरायडीह गांव की रहने वाली आदिवासी विधवा पार्वती देवी, आज भी अपने टूटे हुए घर की जगह एक पक्के आश्रय की तलाश में दर-दर भटक रही हैं। उनके साथ सबसे बड़ी चुनौती यह है कि उनके तीन बच्चों में से दो विकलांग हैं — एक पूरी तरह नेत्रहीन है और दूसरा हाथ-पैर से दिव्यांग।
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पार्वती देवी के पति स्व. छोटका किस्कू का निधन लगभग छह साल पहले हो गया था। उनके जाने के बाद से पार्वती देवी अकेली ही अपने परिवार की जिम्मेदारी ढो रही हैं। पहले उनका एक कच्चा मिट्टी का घर था, जो अब पूरी तरह ध्वस्त हो चुका है। अस्थायी रूप से वह किसी और के घर में शरण ले रही थीं, लेकिन अब वहां से भी उन्हें निकाल दिया गया है।
पार्वती देवी का दर्द
“काम करके किसी तरह बच्चों का पेट पाल लेती हूं, लेकिन अब सवाल है कि रहेंगे कहां? जिनके पास दो वक्त की रोटी नहीं है, वे अब खुले आसमान के नीचे कैसे जिएंगे?”
उन्होंने बताया कि वह कई बार प्रखंड कार्यालय का चक्कर लगा चुकी हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। न तो प्रधानमंत्री आवास योजना का लाभ मिला और न ही किसी सरकारी अधिकारी ने उनका हालचाल पूछा।
प्रशासन पर उठते सवाल
अब सवाल यह है कि जब एक विधवा आदिवासी महिला, जिसके दो बच्चे विकलांग हैं, आवास जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित है — तो आखिर लाभ किन्हें दिया जा रहा है?
क्या सरकारी कर्मी जमीनी सर्वे ठीक से कर रहे हैं? या फिर जानबूझ कर ऐसे जरूरतमंदों को नजरअंदाज किया जा रहा है?





















