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Wednesday, October 28, 2026

पितृपक्ष 2025: 7 सितंबर से आरंभ, इन 15 दिनों में भूलकर भी न करें ये 6 काम, नहीं तो रूठ जाएंगे पितर!…

सनातन धर्म में पितृपक्ष का विशेष महत्व है। यह 15 दिवसीय काल वह समय होता है जब माना जाता है कि हमारे पितर (पूर्वज) पृथ्वी पर आते हैं और अपने वंशजों से तर्पण, श्राद्ध एवं पिंडदान के माध्यम से शांति और सम्मान प्राप्त करते हैं। वर्ष 2025 में पितृपक्ष की शुरुआत 7 सितंबर (रविवार) से हो रही है।

यह समय आत्मचिंतन, श्रद्धा और पितरों को स्मरण करने का होता है। साथ ही इस दौरान कुछ नियम और वर्जनाएं भी बताई गई हैं, जिनका पालन अत्यंत आवश्यक माना गया है। इन नियमों का पालन नहीं करने पर पितर रुष्ट हो सकते हैं, जिससे जीवन में बाधाएं और अशुभ फल उत्पन्न हो सकते हैं।

पितृपक्ष 2025 के प्रमुख नियम: क्या करें और क्या न करें

1. मांगलिक कार्यों से करें परहेज

पितृपक्ष के दौरान विवाह, मुंडन, गृह प्रवेश, दुकान/ऑफिस की शुरुआत, नामकरण या कोई भी शुभ कार्य करना शास्त्रों में वर्जित माना गया है। यह काल श्रद्धा और आत्मिक तर्पण के लिए होता है, न कि उत्सव और उल्लास के लिए।

2. असत्य, अपशब्द और छल-कपट से बचें

इन दिनों झूठ बोलना, गाली-गलौच करना, किसी के साथ धोखा या छल करना बहुत अशुभ माना गया है। साथ ही, ब्रह्मचर्य का पालन भी आवश्यक बताया गया है। यह संयम आत्मिक शुद्धता के लिए आवश्यक है।

3. इन चीज़ों का सेवन न करें

पितृपक्ष के दौरान इन भोज्य वस्तुओं का सेवन वर्जित माना गया है:

  • मांस-मछली, शराब, लहसुन-प्याज
  • बैंगन, सरसों का साग, मूली
  • बासी भोजन, मसूर की दाल
  • काला नमक, सत्तू, पान आदि

पितरों की प्रसन्नता के लिए सात्विक और ताजा भोजन ही करें।

4. तर्पण और श्राद्ध में इन बातों का रखें ध्यान

  • काले तिल का उपयोग करें, सफेद तिल वर्जित हैं।
  • लोहे या स्टील के बर्तनों की जगह पीतल या तांबे के बर्तनों का उपयोग करें।
  • श्राद्ध का भोजन बिना चखे बनाया जाए और पकाने वाला पहले न खाए

5. भूखे को न ठुकराएं

यदि पितृपक्ष में कोई गाय, कुत्ता, कौआ, ब्राह्मण या भिक्षुक आपके द्वार आए, तो उनका अपमान या अनदेखी न करें। इन्हें पितरों का प्रतीक माना जाता है।

6. तर्पण का उचित समय चुनें

तर्पण एवं श्राद्ध के लिए दोपहर (अपराह्न) का समय सबसे उत्तम माना गया है। ब्रह्ममुहूर्त में श्राद्ध न करें।

पितरों की कृपा पाने के लिए करें नियमों का पालन

श्रद्धा, सेवा, संयम और नियमों के पालन से ही पितरों की आत्मा को शांति मिलती है और वे प्रसन्न होकर वंश को आशीर्वाद देते हैं। अगर इन 15 दिनों में श्रद्धा पूर्वक विधिवत श्राद्ध किया जाए, तो जीवन में सुख, समृद्धि और संतोष की प्राप्ति होती है।

 

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