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Saturday, June 6, 2026

प्रकृति और पशु-प्रेम का संगम: टुंडी में सोहराय (बन्दना) पर्व की धूम…

धनबाद: धनबाद जिले के टुंडी एवं पूर्वी टुंडी क्षेत्रों में इन दिनों मांदर की थाप और पारंपरिक गीतों की गूंज सुनाई दे रही है। अवसर है आदिवासी संथाल समाज के सबसे बड़े और महत्वपूर्ण पर्व सोहराय (बन्दना) का। पौष माह की कड़ाके की ठंड के बीच प्रकृति और पशुओं के प्रति कृतज्ञता प्रकट करने वाला यह पर्व पूरे क्षेत्र को उल्लास और उत्साह से भर रहा है।

सोहराय पर्व केवल एक धार्मिक आयोजन नहीं, बल्कि मानव और पशुओं के बीच गहरे संबंध का प्रतीक है। इस पर्व के माध्यम से उन गायों और बैलों को सम्मान दिया जाता है, जिनकी मेहनत से खेतों में फसल लहलहाती है। अच्छी पैदावार की खुशी में आदिवासी समाज अपने पशुधन के साथ उत्सव मनाता है और आने वाले वर्ष में भी बेहतर फसल की कामना करता है।

संथाल समाज द्वारा यह पर्व 10 जनवरी से 14 जनवरी तक पांच अलग-अलग चरणों में मनाया जाता है, जिनका अपना-अपना धार्मिक एवं सामाजिक महत्व है—

पहला दिन (उम): इस दिन घरों एवं कृषि उपकरणों की साफ-सफाई की जाती है। लोग स्वयं स्नान करते हैं और मवेशियों को भी नहलाया जाता है।

दूसरा दिन (बोगान): इस दिन कुल देवता (इष्ट देव) की विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है।

तीसरा दिन (खुंटौ/बरद खुटा): इस दिन खूंटे से बंधे मवेशियों की पूजा कर उनके प्रति सम्मान और उत्साह प्रकट किया जाता है।

चौथा दिन (जलो): सामाजिक समरसता का दिन होता है, जिसमें लोग आपसी भेदभाव भुलाकर एक-दूसरे के घर जाकर मेल-मिलाप करते हैं।

पांचवां दिन (हाको कटा): पर्व के अंतिम दिन पारंपरिक रूप से शिकार पर निकलने की परंपरा निभाई जाती है।

सोहराय पर्व के माध्यम से आदिवासी समाज न केवल अपनी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रखता है, बल्कि प्रकृति संरक्षण और पशु-प्रेम का संदेश भी देता है।

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