गिरिडीह: झारखंड की राजनीति में सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के बाद शोक के साथ-साथ उनकी राजनीतिक विरासत को लेकर चर्चाएं शुरू हो गई हैं। झारखंड मुक्ति मोर्चा के वरिष्ठ नेताओं में शामिल रहे सुदिव्य कुमार सोनू ने लंबे राजनीतिक सफर के दौरान संगठन से लेकर विधानसभा और सरकार तक अपनी अलग पहचान बनाई थी।
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उनकी अंतिम विदाई के बाद गिरिडीह में एक बड़ा सवाल राजनीतिक गलियारों में उठने लगा है कि आखिर सुदिव्य कुमार सोनू के बाद उनकी बनाई राजनीतिक जमीन और संगठनात्मक विरासत को कौन संभालेगा?
हालांकि, इस संबंध में झामुमो या उनके परिवार की ओर से किसी उत्तराधिकारी को लेकर कोई औपचारिक घोषणा सामने नहीं आई है। फिलहाल राजनीतिक भविष्य को लेकर हो रही चर्चाओं को संभावनाओं और अटकलों के तौर पर ही देखा जा रहा है।
सवाल सिर्फ गिरिडीह विधानसभा सीट का नहीं
सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के बाद चर्चा केवल गिरिडीह विधानसभा सीट तक सीमित नहीं है। उन्होंने वर्षों तक पार्टी संगठन में काम करते हुए कार्यकर्ताओं का एक मजबूत नेटवर्क तैयार किया था।
करीब तीन दशक तक झामुमो से जुड़े रहने के दौरान उन्होंने संगठन में कई जिम्मेदारियां निभाईं। वर्ष 2019 में वह पहली बार गिरिडीह से विधायक बने और 2024 में लगातार दूसरी बार चुनाव जीतकर अपनी राजनीतिक पकड़ मजबूत की।
इसके बाद उन्हें राज्य सरकार में महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी मिली। ऐसे में पार्टी के सामने चुनौती केवल नया उम्मीदवार चुनने की नहीं, बल्कि सुदिव्य सोनू के समर्थकों और संगठनात्मक नेटवर्क को एकजुट बनाए रखने की भी होगी।
क्या परिवार से सामने आएगा नया राजनीतिक चेहरा?
गिरिडीह के राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी हो रही है कि क्या सुदिव्य कुमार सोनू के परिवार से कोई सदस्य उनकी राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाएगा। उनकी पत्नी श्वेता शर्मा के नाम को लेकर भी चर्चाएं सामने आ रही हैं।
हालांकि, अभी तक परिवार या पार्टी की ओर से इस विषय में कोई औपचारिक फैसला अथवा राजनीतिक घोषणा नहीं की गई है।
भारतीय राजनीति में कई मौकों पर किसी लोकप्रिय नेता के निधन के बाद परिवार के सदस्य ने चुनावी राजनीति में प्रवेश कर उनकी विरासत को आगे बढ़ाया है। लेकिन गिरिडीह में किसी भी संभावित फैसले के पीछे पार्टी संगठन, स्थानीय समीकरण और चुनावी परिस्थितियां महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।
JMM के सामने संगठन और सीट दोनों बचाने की चुनौती
सुदिव्य कुमार सोनू का राजनीतिक महत्व केवल एक विधायक तक सीमित नहीं था। वर्ष 1989 में झामुमो से जुड़ने के बाद उन्होंने पार्टी संगठन में लंबा समय बिताया और वर्ष 2003 में गिरिडीह जिला अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी संभाली।
उनके निधन के बाद झामुमो के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो सकती है। पहली चुनौती गिरिडीह विधानसभा क्षेत्र के लिए एक मजबूत और स्वीकार्य चेहरा तलाशने की होगी। दूसरी चुनौती उनके समर्थकों और वर्षों में तैयार हुए संगठनात्मक ढांचे को एकजुट बनाए रखने की होगी।
सुदिव्य कुमार सोनू की व्यक्तिगत पहचान और कार्यकर्ताओं के साथ उनका संपर्क किसी नए नेता को तुरंत हासिल नहीं हो सकता। इसलिए पार्टी के लिए आने वाले दिनों में संगठनात्मक संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण होगा।
विपक्ष के लिए भी बदल सकते हैं चुनावी समीकरण
सुदिव्य कुमार सोनू के निधन के बाद गिरिडीह की राजनीति में विपक्ष के लिए भी नए राजनीतिक समीकरण बनने की संभावना जताई जा रही है। 2024 के विधानसभा चुनाव में उनकी जीत का अंतर करीब 3,838 वोट था, जबकि 2019 में उन्होंने करीब 15,884 मतों के अंतर से जीत दर्ज की थी।
इन आंकड़ों से यह संकेत मिलता है कि आने वाला चुनावी मुकाबला काफी महत्वपूर्ण हो सकता है। यह केवल एक विधानसभा सीट का चुनाव नहीं होगा, बल्कि झामुमो की संगठनात्मक ताकत, सुदिव्य सोनू की राजनीतिक विरासत और विपक्ष की रणनीति की भी परीक्षा होगी।
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कौन बनेगा सुदिव्य सोनू के बाद गिरिडीह का नया चेहरा?
फिलहाल गिरिडीह शोक में है और सुदिव्य कुमार सोनू के निधन से पैदा हुआ राजनीतिक खालीपन साफ महसूस किया जा रहा है। उनकी अंतिम यात्रा में लोगों की मौजूदगी ने उनके जनाधार और सामाजिक जुड़ाव की चर्चा को भी मजबूत किया है।
लेकिन राजनीति में संगठन और चुनावी प्रक्रिया आगे बढ़ती रहती है। आने वाले समय में झामुमो को तय करना होगा कि गिरिडीह में पार्टी की कमान किस चेहरे के हाथों में दी जाए।
क्या पार्टी परिवार के किसी सदस्य पर भरोसा करेगी या संगठन से ही किसी अनुभवी नेता को आगे बढ़ाएगी? इसका जवाब आने वाले राजनीतिक घटनाक्रम से मिलेगा। फिलहाल एक बात स्पष्ट है कि सुदिव्य कुमार सोनू का राजनीतिक सफर भले ही अचानक थम गया हो, लेकिन गिरिडीह की राजनीति में उनकी बनाई विरासत को लेकर चर्चा अभी लंबे समय तक जारी रहने वाली है।






















