छत्तीसगढ़:छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने एक दिलचस्प मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए तलाकशुदा दंपती की दोबारा साथ रहने की अपील को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट रूप से कहा कि न्यायिक फैसले भावनाओं पर नहीं, तथ्यों और कानून पर आधारित होते हैं।
Highlights:
क्या है मामला?
बिलासपुर जिले की रहने वाली एक युवती ने सरकंडा थाना क्षेत्र के मोपका निवासी युवक से शादी की थी। समय के साथ रिश्ते में तनाव बढ़ा और 2021 में दोनों ने आपसी सहमति से तलाक के लिए अर्जी दी थी। फैमिली कोर्ट ने कूलिंग पीरियड हटाते हुए 2025 में तलाक मंजूर किया।
तलाक के कुछ महीनों बाद दोनों ने फिर से साथ रहना शुरू कर दिया और आपसी संबंधों में सुधार का हवाला देते हुए पत्नी की ओर से हाई कोर्ट में अपील दायर की गई, जिसमें साथ घूमने-फिरने, शादी की सालगिरह मनाने की तस्वीरें और आर्थिक लेन-देन के सबूत भी पेश किए गए।
हाई कोर्ट का दो टूक जवाब
हाई कोर्ट ने अपील को खारिज करते हुए कहा कि दोनों ने आपसी सहमति से तलाक लिया था और उस समय कूलिंग पीरियड को हटवाने की खुद पहल की थी, जिससे स्पष्ट है कि उस समय संबंधों को सुधारने की कोई मंशा नहीं थी। अब सिर्फ भावनात्मक आधार पर तलाक को पलटना कानूनन उचित नहीं है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि तलाक का निर्णय साक्ष्यों और तथ्यों के आधार पर लिया गया था और उस फैसले के खिलाफ इस तरह की अपील कानूनी रूप से मान्य नहीं है।
कानूनी विशेषज्ञ क्या कहते हैं?
विवाह कानून के जानकारों के अनुसार, एक बार आपसी सहमति से लिया गया तलाक अंतिम माना जाता है, और यदि तलाकशुदा दंपती दोबारा साथ रहना चाहते हैं, तो उन्हें नई शादी करनी होती है, न कि पुराने फैसले को रद्द कराने की कोशिश।
न्यायालय की टिप्पणी:
“कोर्ट भावनाओं से नहीं, तथ्यों और कानून से चलता है। आपसी सहमति से दिया गया तलाक पलटा नहीं जा सकता।”





















