धनबाद: धनबाद के गांधी सेवा सदन में हाल ही में एक ऐसी शादी संपन्न हुई, जिसने शोर-शराबे और दिखावे की परंपराओं से हटकर समाज को सोचने पर मजबूर कर दिया।
न ढोलक थी, न शहनाई, न पंडित, न बाराती और न ही सात फेरे—फिर भी दो लोग जीवन भर के लिए एक-दूसरे के हो गए।
यह विवाह वैचारिक विवाह पद्धति से संपन्न हुआ, जिसमें सादगी और समानता को केंद्र में रखा गया। दुल्हन के माता रानी प्रजापति और पिता कामरेड अजय प्रजापति ने बिना किसी आडंबर के कन्यादान किया।
दुल्हन पेशे से कवयित्री हैं और सीपीआई(एमएल) की सक्रिय व प्रखर नेत्री हैं, जबकि दूल्हा भी इसी पार्टी का कार्यकर्ता है। दोनों की मुलाकात पटना में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान हुई थी, जहां पहले विचार मिले और फिर धीरे-धीरे रिश्ता जीवनसाथी तक पहुंचा।
दुल्हन धनबाद के हीरापुर की निवासी हैं, जबकि दूल्हा उत्तर प्रदेश के जौनपुर से ताल्लुक रखता है। भौगोलिक दूरी अलग थी, लेकिन दोनों की सोच और प्रतिबद्धता एक जैसी रही।
दुल्हन ने कहा कि वे कामरेड विचारधारा में विश्वास रखती हैं और शादी के नाम पर होने वाली फिजूलखर्ची, दहेज और सामाजिक दबाव से दूर रहना चाहती थीं। इसी सोच के तहत उन्होंने वैचारिक विवाह का रास्ता चुना।
विवाह के दौरान दोनों ने मार्क्सवादी–लेनिनवादी विचारधारा पर चलते हुए मजदूरों और किसानों के अधिकारों की लड़ाई में जीवन भर साथ रहने की शपथ ली।
यह शादी सिर्फ़ दो व्यक्तियों का मिलन नहीं थी,
बल्कि एक सामाजिक संदेश भी—
कि रिश्ते शोर से नहीं,
सोच से मजबूत होते हैं,
और सादगी, बराबरी व विचारों के साथ भी
जीवन को पूरे सम्मान के साथ जिया जा सकता है।






















