बिहार: बिहार की सियासत में इस बार चुनावी मौसम की पहली आंधी टिकटों की फेहरिस्त से उठी है। भाजपा ने एक झटके में 21 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिये और इस फैसले ने चुनावी गलियारों में हलचल मचा दी है। बिहार की राजनीति में जातीय समीकरण किसी भी चुनावी जीत की पहली सीढ़ी होती है। भाजपा ने 49 सवर्ण, 40 पिछड़ा-अति पिछड़ा और 12 दलित प्रत्याशियों को मैदान में उतारा है। इनमें 21 राजपूत, 16 भूमिहार, 11 ब्राह्मण, 13 वैश्य, 12 अति पिछड़ा, 12 दलित, 7 कुशवाहा, 6 यादव, 2 कुर्मी और 1 कायस्थ प्रत्याशी शामिल हैं। यह रणनीति पुराने वोट बैंक को थामे रखने और नये समीकरण बुनने की कोशिश मानी जा रही है। गांव के बरामदे में बैठे बुजुर्ग ने कहा, “ये चुनाव चेहरों का नहीं, जातियों के जोड़ का खेल है बेटा…”
कई पुराने चेहरों को पार्टी ने किनारे कर दिया। रीगा से मोतीलाल प्रसाद की जगह बैद्यनाथ प्रसाद, सीतामढ़ी से मिथिलेश कुमार की जगह पूर्व सांसद सुनील कुमार पिंटू को टिकट। राजनगर में रामप्रीत पासवान की जगह सुजीत पासवान, नरपतगंज में जयप्रकाश यादव की जगह देवंती यादव को मौका मिला। गौड़ागौराम में स्वर्णा सिंह की जगह सुजीत कुमार सिंह, औराई में रामसूरत राय की जगह रमा निषाद मैदान में उतारा गया है। पटना के कुम्हरार से अरुण कुमार सिन्हा की जगह संजय गुप्ता, पटना साहिब से नंद किशोर यादव की जगह रत्नेश कुशवाहा उतरे हैं। दरभंगा की अलीनगर सीट पर इस बार लोकगायिका मैथिली ठाकुर को टिकट मिला है। मिश्रीलाल यादव के राजद में जाने के बाद पार्टी ने ये दांव चला। कटोरिया में डॉ. निक्की हेम्ब्रम की जगह पूरण लाल टुडू, बाढ़ में ज्ञानेंद्र सिंह ज्ञानू की जगह डॉ. सियाराम सिंह, आरा में अमरेंद्र प्रताप सिंह की जगह संजय सिंह ‘टाइगर’, छपरा में डॉक्टर सी. एन. गुप्ता की जगह छोटी कुमारी को चुनाव मैदान में उतारा गया है। पिछली बार 110 सीटों पर उतरी भाजपा ने इस बार 101 सीटों पर उम्मीदवार उतारे हैं। 2015 में 74 सीटों की जीत के बाद यह बदलाव सीधे गठबंधन की नई रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है।





















