
ग्रामीण बोले—यहां के कोयले की गुणवत्ता थी सबसे बेहतरीन, रोजगार का अवसर मिले तो बदल सकती है तस्वीर
जामताड़ा:जामताड़ा जिले के फतेहपुर प्रखंड के ताराबाद गांव की पहचान कभी कोयले की काली चमक से होती थी। एक समय यहां एक बड़ी कंपनी द्वारा संचालित कोलियरी से न केवल ताराबाद बल्कि आसपास के कई गांवों के लोगों की आजीविका चलती थी। खेतों के काम के साथ बड़ी संख्या में ग्रामीण खदानों में मजदूरी कर अपने परिवार का भरण-पोषण करते थे।
ग्रामीणों का कहना है कि उस दौर में ताराबाद का कोयला अपनी उत्कृष्ट गुणवत्ता के लिए प्रसिद्ध था। यहां से निकलने वाला कोयला चितरा और प्लास्थली कोलियरी से भी बेहतर माना जाता था। खदान के सक्रिय रहने के समय गांव में रौनक थी — दुकानों में चहल-पहल रहती थी और हर घर के चूल्हे जलते थे।
लेकिन धीरे-धीरे कंपनी की आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी। लगातार बढ़ते बिजली बिल और संचालन लागत के कारण कंपनी को भारी नुकसान उठाना पड़ा। अंततः खदान को बंद करने का निर्णय लिया गया।
इसके बाद से ताराबाद जैसे ठहर-सा गया — जहाँ कभी कोयला खोदा जाता था, अब वहाँ तालाबनुमा गड्ढों में मछली पालन किया जा रहा है। यही अब ग्रामीणों की नई आजीविका बन चुकी है।
ग्रामीणों का कहना है कि आज भी जमीन के नीचे पर्याप्त मात्रा में कोयला मौजूद है। अगर सरकार चाहे तो इस कोलियरी को फिर से चालू किया जा सकता है। उनका मानना है कि यहां का कोयला इतना गुणवत्तापूर्ण है कि बड़ी कंपनियां भी इसके दोहन में दिलचस्पी दिखा सकती हैं।
स्थानीय लोगों ने जिला प्रशासन और राज्य सरकार से मांग की है कि ताराबाद कोलियरी के पुनरुद्धार की दिशा में ठोस कदम उठाए जाएं।
ग्रामीणों का कहना है कि जब कोलियरी चालू थी तब गांव में कोई बेरोजगार नहीं था। मजदूरों को समय पर मजदूरी मिलती थी और गांव में खुशहाली थी। अब खदान बंद होने के बाद लोग रोजगार की तलाश में दूसरे राज्यों की ओर पलायन कर रहे हैं।
स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने भी इस मांग का समर्थन किया है। उनका कहना है कि अगर कोलियरी फिर से शुरू होती है तो इससे न सिर्फ ताराबाद बल्कि आस-पास के गांवों की आर्थिक स्थिति में सुधार होगा और राजस्व आय में भी वृद्धि होगी।
ग्रामीण आज भी उम्मीद लगाए बैठे हैं कि एक दिन फिर से उनके गांव में कोयले की महक फैलेगी और ताराबाद की किस्मत फिर से चमक उठेगी।





















