Jharkhand Delimitation, रांची: केंद्र सरकार की ओर से प्रस्तावित परिसीमन के विरोध में राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में रविवार को आदिवासी एकता महाजुटान रैली आयोजित की गई। पूर्व मंत्री और कांग्रेस नेता बंधु तिर्की के नेतृत्व में हुए इस कार्यक्रम में झारखंड के विभिन्न जिलों से बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग पहुंचे।
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आयोजकों की ओर से करीब एक लाख लोगों के जुटने का दावा किया गया। सुबह से ही अलग-अलग जिलों से लोगों के रांची पहुंचने का सिलसिला जारी रहा। रैली में महिलाओं, बुजुर्गों, युवाओं और बच्चों की भी भागीदारी देखने को मिली।
परिसीमन को लेकर आदिवासी समाज की चिंता
महाजुटान के मंच से प्रस्तावित परिसीमन का मुद्दा प्रमुखता से उठाया गया। कार्यक्रम में कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश, प्रभारी के. राजू, रामेश्वर उरांव, मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की, सुबोध कांत सहाय, सुखदेव भगत, विधायक राजेश कच्छप, नमन विक्सल कोंगाड़ी और ऑल इंडिया आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. विक्रांत भूरिया समेत कई नेता मौजूद रहे।
वक्ताओं ने कहा कि परिसीमन को केवल निर्वाचन क्षेत्रों के पुनर्गठन तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। उनके मुताबिक इसका असर आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों पर भी पड़ सकता है।
चंदा जुटाकर पहुंचे लोग, दिहाड़ी छोड़कर लिया हिस्सा
मोरहाबादी मैदान में जुटी भीड़ में राजनीतिक कार्यकर्ताओं के साथ ग्रामीण और आदिवासी इलाकों से आए आम लोग भी शामिल रहे। कई बुजुर्ग महिलाओं ने बताया कि वे आपस में चंदा जुटाकर रांची पहुंचीं।
कुछ लोगों ने कहा कि उन्होंने एक दिन की मजदूरी छोड़कर महाजुटान में हिस्सा लिया, क्योंकि वे इसे अपने समाज और आने वाली पीढ़ियों के अधिकारों से जुड़ा मुद्दा मानते हैं। कई महिलाएं अपने साथ खाना-पानी लेकर पहुंचीं और मैदान में बैठकर भोजन करती भी नजर आईं।
झारखंड में परिसीमन को लेकर क्यों है चिंता?
परिसीमन का मतलब लोकसभा और विधानसभा निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाओं और सीटों का नए सिरे से निर्धारण करना है। संविधान के अनुच्छेद 82 के तहत जनगणना के बाद संसद कानून बनाकर परिसीमन की प्रक्रिया का प्रावधान करती है। परिसीमन आयोग जनसंख्या समेत भौगोलिक और प्रशासनिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण करता है।
झारखंड में मौजूदा लोकसभा और विधानसभा सीटों का ढांचा पिछले परिसीमन के आधार पर है। आदिवासी समाज की चिंता मुख्य रूप से एसटी आरक्षित सीटों और राजनीतिक प्रतिनिधित्व को लेकर है। फिलहाल झारखंड विधानसभा में 28 सीटें और लोकसभा में 5 सीटें एसटी के लिए आरक्षित हैं।
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महाजुटान में आदिवासी संगठनों और नेताओं ने आशंका जताई कि यदि भविष्य में सीटों और निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन मुख्य रूप से जनसंख्या के अनुपात के आधार पर हुआ, तो आदिवासी बहुल क्षेत्रों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर असर पड़ सकता है।
उनका कहना है कि परिसीमन में आदिवासी बहुल क्षेत्रों की विशेष परिस्थितियों, ऐतिहासिक विस्थापन और संवैधानिक संरक्षणों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। मंच से ‘अब नहीं तो कभी नहीं’ का नारा भी दिया गया।
हालांकि, यह स्पष्ट करना जरूरी है कि परिसीमन के बाद झारखंड में एसटी सीटें निश्चित रूप से घटेंगी, ऐसा अभी कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। सीटों में संभावित बदलाव को लेकर अलग-अलग आकलन और राजनीतिक दावे सामने आ रहे हैं।
केंद्र के प्रस्ताव और 816 लोकसभा सीटों की चर्चा
परिसीमन को लेकर केंद्र सरकार की ओर से 2026 में विधायी पहल किए जाने की बात सामने आई है। प्रस्तावित व्यवस्था में लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों की संख्या बढ़ाकर करीब 816 किए जाने का मॉडल चर्चा में रहा है।
केंद्र सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया है कि सीटों की संख्या बढ़ने से राज्यों का प्रतिनिधित्व बढ़ाया जा सकता है। वहीं, झारखंड में आदिवासी संगठन इस प्रक्रिया में अपने राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों को लेकर अपनी चिंताएं लगातार सामने रख रहे हैं।
मोरहाबादी का यह महाजुटान ऐसे समय में हुआ है, जब परिसीमन का मुद्दा झारखंड की राजनीति में तेजी से चर्चा का विषय बन रहा है। आने वाले समय में इस मुद्दे को लेकर राजनीतिक दलों और आदिवासी संगठनों की रणनीति पर नजर रहेगी।






















