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Wednesday, September 9, 2026

महाभियोग प्रस्ताव स्वीकार: न्यायपालिका पर जवाबदेही की संवैधानिक कसौटी पर जस्टिस यशवंत वर्मा…

नई दिल्ली:भारत के संवैधानिक इतिहास में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ गया है। लोकसभा में मंगलवार को औपचारिक रूप से जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पढ़ा गया, जिससे उन्हें पद से हटाने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने का रास्ता साफ हो गया है। यह मामला न केवल न्यायिक नैतिकता की जाँच है, बल्कि संविधान के अनुच्छेदों की व्यावहारिक शक्ति का भी परीक्षण है।

आग, नकदी और आरोपों की शुरुआत

मामले की शुरुआत मार्च 2025 में हुई, जब दिल्ली स्थित जस्टिस वर्मा के आधिकारिक आवास पर आग लगने की घटना में जले हुए नकदी के बंडल पाए गए। उस वक्त वे घर पर मौजूद नहीं थे, लेकिन बाद में एक आंतरिक न्यायिक जांच ने पाया कि वे उस नकदी पर ‘नियंत्रण’ रखते थे। यह निष्कर्ष गंभीर था, जिसने उच्च न्यायालय की गरिमा पर सवाल खड़े कर दिए।

महाभियोग प्रस्ताव और संवैधानिक प्रक्रिया

31 जुलाई 2025 को लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को महाभियोग प्रस्ताव प्राप्त हुआ, जिस पर कुल 146 लोकसभा और 63 राज्यसभा सदस्यों के हस्ताक्षर थे।
प्रस्ताव संविधान के अनुच्छेद 124(4), 217 और 218 के तहत लाया गया है, जो किसी उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को “दुर्व्यवहार या अक्षमता” के आधार पर हटाने की प्रक्रिया का प्रावधान करता है।

तीन सदस्यीय जांच समिति गठित

न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत एक वैधानिक समिति बनाई गई है जिसमें शामिल हैं:

  • सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार
  • मद्रास हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश मनिंदर मोहन श्रीवास्तव
  • वरिष्ठ अधिवक्ता वीवी आचार्य (कर्नाटक हाईकोर्ट)

यह समिति अब इस बात की जांच करेगी कि क्या न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ आरोप हटाने योग्य स्तर तक गंभीर हैं।

सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं

जस्टिस वर्मा ने जांच की प्रक्रिया को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी। अदालत ने कहा कि वर्मा ने पहले जांच प्रक्रिया में भाग लिया और फिर उसकी वैधता पर सवाल उठाया — यह व्यवहार स्वीकार्य नहीं है

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